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डाकू अंगुलिमाल की कहानी – बुद्ध सन्देश (buddha motivational story)

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डाकू अंगुलिमाल की कहानी – बुद्ध सन्देश (buddha motivational story)


बहुत समय पहले की बात हैं, एक पागल हत्यारा था. जिसका नाम – अंगुलिमाल था. अंगुलिमाल ने एक व्रत ले रखा था की वह अपने जीवन में एक हज़ार लोगो को जान से मारेगा. अंगुलिमाल के व्रत लेने का एक कारण था, दरअसल अंगुलिमाल जहाँ रहता था वहां के लोग उससे उचित व्यवहार नही करते इसलिए, उसने बदला लेने का निश्चय किया. इसलिए वह हज़ार लोगो को मारने का व्रत लेता हैं. अंगुलिमाल जिस किसी को मारता हैं उसकी एक अंगुली काट लेता और उसके गर्दन पर एक माला जैसा निशान बना देता.

इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ गया.इसलिए अंगुलिमाल से सभी डरते थे, यहाँ तक राजा भी डरते थे. जिस इलाके में अंगुलिमाल रहता था वहां आस पास कोई भी नहीं रहता था, सभी लोग उस इलाके को छोड़कर भाग जाते थे. इसलिए अंगुलिमाल के लिए यह कठिन हो गया की वह अपना व्रत कैसे पूरा करे.एक दिन बुद्ध उस गाँव के पास जंगल में रहने के लिए गए हुए थे, जब बुद्ध उस गाँव से गुजर रहे थे, तब गाँव वालों ने कहा की आप इस जंगल में मत जाओ वहां पर एक पागल हत्यारा रहता हैं.

जिसने अभी तक नौ हज़ार नौ सौ निन्यानवे लोगो की हत्या कर दी हैं. कृपया आप वहां मत जाइये. अंगुलिमाल किसी को मारने से पहले दो बार नहीं सोचता. वह यह नहीं देखेगा कि आप बुद्ध हैं. बुद्ध कहते हैं – यदि वहां मैं नहीं जाऊंगा तो और कौन जायेंगा? वह किसी एक का ही तो इंतज़ार कर रहा हैं, इसीलिए मैं ही चला जाता हूँ. मैं वहां जाने का जोखिम लेना चाहूँगा. या तो वह मुझे मारेगा या फिर मैं उसको मारूँगा. इतना कहकर बुद्ध वहां से चले जाते हैं. बुद्ध के अनुयायी जिहोने मरते दम तक बुद्ध की शरण की कसमे खाई थी.

उन्होंने भी अंगुलिमाल के डर से अपने कदम पीछे हटा लिए. अंगुलिमाल का डर उनको जंगल के विरुद्ध ले गया, लेकिन बुद्ध आगे बढे. जिस वक्त बुद्ध जंगल में बहुत आगे पहुंचे तब अंगुलिमाल एक चट्टान पर बैठा था. अगुलिमाल ने सोचा की शायद इस आदमी इस बात का अंदाज़ा नहीं हैं की मैं यहाँ पर हूँ अगर इसको इस बात का ध्यान होता तो ये यहाँ पर नहीं आता. जब बुद्ध उस चट्टान पर पहुंचे तो अंगुलिमाल ने बुद्ध को ध्यान से देखा तो, बुद्ध बहुत मासूम लगे. उसने बुद्ध को न मारने की सोची, और अपने व्रत को पूरा करने के लिए किसी और को मारने का निश्चय किया.

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जैसे ही महात्मा बुद्ध उसके नजदीक आये अंगुलिमाल ने कहा की यहाँ से लौट जाओ, आगे मत आओ. मैं अंगुलिमाल हूँ मैंने नौ हज़ार नौ सौ निन्यानवे लोगो को मार दिया हैं. अब मुझे केवल एक अंगुली की जरुरत हैं. मैंने अपनी माँ को भी नहीं छोड़ा, तुम यहां से लौट जाओ. तुम मेंरे पास मत आओ.तुम एक सन्यासी की तरह लगते हो, हालाँकि मैं किसी धर्म में विश्वास नहीं करता पर मुझे तुम्हारी मासूमियत मारने नहीं देंगी. इसलिए तुम अपने कदम आगे मत बढाओं, लौट जाओ, नहीं तो मुझे तुम्हे जबरदस्ती मारना पड़ेगा.

इसके बावजूद अभी भी बुद्ध अंगुलिमाल की तरफ बढ़ रहे थे. अंगुलिमाल ने सोचा की हो सकता हैं की यह आदमी बहरा और पागल हो? इसलिए उसने चिल्लाकर बोला आगे मत आओ, वापस लौट जाओ. बुद्ध ने कहा – मैं तो बहुत पहले ही रुक गया हूँ. मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ, अंगुलिमाल, जा, तो तुम रहे हो. मैं तो हर क्षण में रुका हुआ हूँ. जब मेरे लिए कोई प्रेरणा ही नहीं हैं तो मैं कैसे आगे बढ़ सकता हूँ? मेरे लिए कोई लक्ष्य नहीं हैं, जब मैंने अपने सारे लक्ष्य को प्राप्त कर लिए हैं तो फिर मुझे अब चलने की जरुरत क्या हैं. चल तो तुम रहे हो, रुकने की सलाह तो मुझे तुमको देनी चाहिए.

तुम रुक जाओ.अंगुलिमाल अब तक चट्टान पर बैठा था. वहीँ से वह हंसने लगा तुम वाकई में पागल हो. मैं तो यहाँ पर बैठा हूँ और तुम मुझको ही रुकने की सलाह दे रहे हो. चल तो तुम रहे हो और कहते हो की तुम रुके हुए हो. बुद्ध उसके पास आये और कहा मैंने सुना हैं की तुमको एक और अंगुली की जरुरत हैं. मेरे इस शरीर ने सभी लक्ष्य को पूरे कर लिए हैं. मरने के बाद मेरे इस शरीर को जला दिया जायेगा तब यह किसी काम का नहीं रहेगा. अगर अभी किसी के काम आ जाये, इससे बेहतर क्या हो सकता हैं.

तुम इस शरीर का उपयोग कर सकते हो, और अपने व्रत को पूरा कर सकते हों. तुम मेरी अंगुली को काट दो और मेरे गले को भी काट लो. मैं इसी उद्देश्य से यहाँ पर आया हूँ, की मेरा शरीर भी कुछ काम आ जाये. मरने के बाद वैसे भी इस शरीर को जला दिया जायेगा. अंगुलिमाल ने कहा की यह तुम क्या कह रहे हो? मुझे लग रहा था की यहाँ पर अकेला मैं ही पागल हूँ, लेकिन तुम ज्यादा होशियार बनने की कोशिश मत करो मैं तुमको यहीं पर मार सकता हूँ.

कहानी – डाकू अंगुलिमाल और महात्मा बुद्ध (एक संदेश)

बुद्ध ने कहा की मुझे मारने से पहले एक काम कर दो तुम? तुम इस पेड़ की एक टहनी काट दो. अंगुलिमाल ने झट से पास में खड़े एक बड़े पेड़ की टहनी को काट दिया. बुद्ध ने कहा – अभी एक चीज और, इस टहनी को वापस पेड़ से जोड़ दो. अंगुलिमाल ने कहा – अब तो तुम निश्चित रूप से पागल हो. मैं इस पेड़ को तोड़ तो सकता हूँ, लेकिन जोड़ नहीं सकता.

बुद्ध हंसने लगे – जब तुम किसी चीज को बिगाड़ सकते हो और उसको सुधार नहीं सकते तो तुमको बिगाड़ना भी नहीं चाहिए, बिगाड़ना तो बच्चों का काम हैं, और मुझे तो इसमें कोई बहादुरी नहीं दिखती. इस टहनी को तो कोई काट सकता हैं लेकिन जो इसको जोड़ देगा वो कोई बहादुर ही हो सकता हैं. और तुम भी इसको वापस नहीं जोड़ सकते. जब तुम इस टहनी को नहीं जोड़ सकते तो तुम इंसानों के हाथो को क्या जोड़ोगे? क्या तुमने कभी इसके बारे में सोचा हैं?

अंगुलिमाल ने अपनी आँखे बंद की और बुद्ध के चरणों में गिर गया और बोला है आपने मुझे सही रास्ता दिखा दिया हैं. अंगुलिमाल एक क्षण में ही प्रबुद्ध बन गया. अगले दिन से ही उसने बुद्ध की शरण ग्रहण कर ली. अब अंगुलिमाल एक भिक्षु बन गया था. बौद्ध भिक्षु होने के नाते अंगुलिमाल भी भिक्षा टन के लिए जाता था. अंगुलिमाल को देखकर लोग अपने घर के दरवाजे बंद कर देते थे. लोग अभी भी उससे डरते थे, कहीं अंगुलिमाल किसी के ऊपर हमला न कर दे. इसलिए किसी ने भी अंगुलिमाल को भिक्षा नहीं दी. जब जब अंगुलिमाल भिक्षा के लिए गुजरता तो लोग उस पर पत्थर बरसाते, यहाँ तक की उसके घरवाले भी.

अंगुलिमाल के पूरे शरीर से खून बहने लगा. तब वह वापस बुद्ध के पास गया. बुद्ध ने उसकी हालत देखकर पुछा की कैसा लग रहा हैं अंगुलिमाल ने बुद्ध को कहा – धन्य है आप बुद्ध, जिन्होंने मेरी आँखे खोल दी. अभी जिन्होंने मेरे उपर पत्थर बरसाए वो इस शरीर को मार सकते हैं, लेकिन मुझे छु भी नहीं सकते हैं. मैंने अपनी जिन्दगी में जितनी भी हत्याए की हैं उसका मुझे कोई तथ्यात्मक ज्ञान नहीं था. पर आपने मुझे एक क्षण में ही सब कुछ पढ़ा दिया हैं.
इसके बाद अंगुलिमाल एक बहुत ही बड़ा बौद्ध भिक्षु बन गया.


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महात्मा बुद्द् और एक फ़िलोसोफर

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