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Sant Kabir Das ki kahani | कबीर दास की कहानी-कथा इन हिंदी

कबीर पंथ (kabir panth) क्या है? कबीर दास जी कौन थे? मुस्लिम या हिंदू. कबीर दास जी के जीवन की कहानियां (kabir das ki kahani). संत कबीर साहेब एक महान संत, कवि और महान समाज सुधारक हुए थे. उनके द्वारा जो पंथ (धर्म) चलाया गया. उसे ही कबीर पंथ कहां जाता है.

इनके पंथ को हिंदू संप्रदाय के लोग और मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग दोनों ही मानते है. प्रारंभ में वे सूत काटते और कपड़ा बुनते थे. कपड़ा बुनते बुनते उन्होंने जीवन के अनमोल दोहो को बुन लिया. जो आज भी उतने ही प्रासंगिक है. जितने उस जमाने में थे. कबीर दास जी निर्गुण निराकार ब्रह्मा (विष्णु) संत थे. जो अंधविश्वास और पाखंड मंदिर मस्जिद के घोर विरोधी थे. उनका मानना था कि ध्यान लगाने से ही ईश्वर को पाया जा सकता है. kabir saheb ki kahani.

1. kabir das ki kahani

कबीर साहेब और उनके जन्म की कथा

कबीर दास जी के जन्म की कहानी अत्यंत रोचक एव अविश्वसनीय है. कबीर दास जी के जन्म के बारे में कई विद्वानों का अलग-अलग मत हैं. कुछ विद्वान उन्हें हिंदू मानते हैं. और उन्हें मुस्लिम मानते है. लेकिन उनके जन्म के बारे में कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है. ज्यादातर विद्वानों का मानना है कि, कबीर दास जी का जन्म 14वी शताब्दी के अंत (सन 1398) में वाराणासी, उत्तरप्रदेश में हुआ था. एक बार की बात है. एक मुस्लिम परिवार नीरू और नीमा जिसके कोई संतान नहीं थी. दोनों रोजाना अल्लाह से संतान की प्रार्थना करते थे.

1 दिन में वे तालाब से होकर जा रहे थे. तब उन्होंने कमल के फूल के ऊपर एक बच्चे को देखा. वे उनके दौड़कर पास गए. वह बच्चा हंसने लगा और हाथ पैर झटपट आने लगा. मानो जैसे कह रहा हो मुझे अपनी शरण में ले लो. नीरू और नीमा जिनके कोई संतान नही थी. वे उस बच्चे को अपने घर ले आते है. यह सोच कर कि यह अल्लाह का दिया हुआ वरदान है.

इस इस प्रकार माना जाता है कि, एक मुस्लिम परिवार ने कबीर दास जी को का पालन पोषण किया था. कबीर दास जी भी उन्हीं अपना माता-पिता समझने लगते. नीरू और नीमा ने बाद में कबीर दास जी को सूत काटना और कपड़े बनाना सिखाया. कबीर दास जी बचपन से ही अध्यात्मिक होते हैं. स्वामी रामानंद जी को उन्होंने अपना अध्यात्मिक गुरु बनाया था. बचपन से ही उनके मन में ईश्वर को जानने की प्रबल इच्छा होती है.

कबीर साहेब और उनकी मृत्यु की कथा

जितनी रोचक उनके जन्म की कहानी है. उतनी ही रोचक एव अविश्वसनीय उनके मृत्यु की कहानी भी है. उस समय लोगो में बहुत अंधविश्वास भरा था. वे लोग मानते थे कि, वाराणासी में मरने वालो को स्वर्ग मिलता है. और मगहर (उत्तरप्रदेश का एक शहर) में मरने पर नर्क मिलता है. जब यह बात कबीर दास जी ने सुनी तो उन्होंने कहा ये नर्क स्वर्ग कुछ नही होता है.

उन्होंने निश्चय किया की वे अपने जीवन के अंतिम दिन मगहर में ही बिताएंगे. जब कबीर दास जी की मृत्यु हुई थी. तब हिंदू संप्रदाय और मुस्लिम धर्म के संप्रदाय मैं काफी विवाद हुआ था. क्योंकि दोनों ही संप्रदाय उन्हें बराबर मानते थे. हिंदू संप्रदाय अपने मुताबिक कबीर दास जी का अंतिम संस्कार करना चाहते थे. वही मुस्लिम संप्रदाय अपने मुताबिक लेकिन. तभी एक चमत्कार होता है. कफन को हटाते हैं. तो उस में फूल मिलते हैं. सभी लोग हैरान रह जाते हैं. यह क्या हुआ उसके बाद दोनों ही संप्रदाय के लोग फूलों का आधा आधा हिस्सा करके. अपने मुताबिक उनका अंतिम संस्कार कर देते हैं. कबीर दास जी की लीलाएं और उनके चमत्कार अविश्वसनीय थे.

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2. kabir saheb ki kahani

कबीर दास जी और एक वेश्या (moll) की कहानी

एक बार की बात है. कबीर दास जी कुटिया के पास एक वेश्या (moll) ने अपना अड्डा (कोठा) बना लिया. कबीर दास जी तो रोजाना भजन कीर्तन करते और भगवान का नाम लेते. वहीं दूसरी ओर सामने वेश्या के कोठे में नाच गाना होता. कबीर दास जी को यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता. वहा बडे अजीब अजीब से लोग आया करते. जो गंदी गंदी बातें और हरकतें करते. नाच गाने की आवाजों से कबीर दास जी प्रभु के ध्यान लगाने में बाधा महसूस करने लगे. एक दिन कबीर दास जी वेश्या के कुटिया के सामने गए और उसे बाहर बुलाया.

कबीर दास जी बोले ‘आप यहां जो कर रही है. वह बिल्कुल भी अच्छा नहीं है. और इससे मेरा प्रभु में ध्यान बार-बार भटक रहा है. आप यहां से चली क्यों नहीं जाती?’ कबीर दास जी की यह बात सुनकर वेश्या भड़क जाती है. वह उच्च स्वरों में बोलती है. ‘ए! फकीर तू मुझे यहां से भगाना चाहता है. अरे समस्या तुझे है. तो तू यहां से चला जा.’ फिर कबीर दास जी चुपचाप अपनी कुटिया में आ जाते हैं और भजन कीर्तन करने लगते हैं. ध्यान ना बट जाए इसलिए वे जोर-जोर से उच्च स्वरों में भजन गाते हैं.

इससे उस वैशया के यहां आने वाले लोग कबीर दास जी के भजनों से प्रभावित होते. वे भी कबीर जी के भजन सुनने के लिए उनके पास बैठ जाते. वेश्या सोचती है यह क्या हो रहा है? सभी लोग वहां जा रहे हैं. ऐसा तो ऐसे तो मेरा धंधा चौपट हो जाएगा. वेश्या अपने लोगों के साथ मिलकर कबीर दास जी की कुटिया में आग लगा देती हैं. जलती हुई कुटिया को देख कबीर दास जी बड़े करुण स्वर में कहते हैं. ‘हे! ईश्वर तो आप भी यही चाहते हैं कि, मैं यहां से चला जाऊं. ठीक है! मैं आपकी आज्ञा स्वीकार करता हूं.’ इसी दौरान एक चमत्कार होता है. एक जोरदार हवा का झोंका आता है जो, उस आग को बुझा देता है. वही एक चिंगारी उस पर वैशया की कुटिया में लग जाती है.

अब वेश्या की कुटिया चलने लगती है. इसे देख वह वेश्या मदद के लिए पुकारती है. लेकिन तब तक उसकी कुटिया पूरी जल जाती है. वह कबीर दास जी के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करती है. वह वेश्या पछतावे की आग में रोने लगती है. उसके बाद वह यहां दोबारा कभी नहीं आती. इसलिए कबीरदास जी कहते है जो ईश्वर को हर रोज याद करता है. ईश्वर भी मुसीबत के समय उसकी पुकार जरुर सुनता है.

3. kabir das ki kahani

कबीर दास जी और कर्जे की कहानी

सुबह उठते ही कबीर दास जी अपने घर में भजन-कीर्तन करते. उनके घर पर भक्तों का जमावड़ा हो जाता था. वहीं पर भजन कीर्तन नाच गाना होता था. यही नहीं कबीर दास जी आए हुए सभी को खाना खिला कर भेजते थे. रोज 200 300 भक्त उनके यहां आते हैं. और सभी को खाना खिलाए बगैर नहीं जाने देते. इससे उनकी पत्नी (लोई) और बेटा (कमाल दास) परेशान हो गए थे. घर में राशन पानी खत्म हो रहा था. घर कर्जे पर चल रहा था.

1 दिन कबीर दास जी ने भक्तों को खाने का न्योता तो दे दिया. लेकिन पत्नी परेशान घर में राशन खत्म हो गया. तो वह पीछे के दरवाजे से गई राशन की दुकान पर और दुकानदार को राशन देने के लिए बोली. ‘मैं तुम्हें और राशन नहीं दे सकता. पहले तुम पुराने कर्जे चुकाओं’, दुकानदार ने कहा. तब वह विनम्र से बोली ‘मेरे पति के आदेश पर घर आए भक्तो खाना खिलाना ही है. दुकानदार बोला, ‘ठीक है मैं तुम्हें राशन दे दूंगा. लेकिन बदले में मैं जो तुमसे मांगू वह तुम्हें देना होगा.’

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कबीर दास की पत्नी अत्यंत सुंदर थी. दुकानदारों उसे गंदी नजरों से देखने लगा था. दुकानदार ने कहा, ‘आज रात तू मेरे घर पर आ जाना और मैं तुम्हारा सारा कर्जा माफ कर दो दूंगा.’ वह थोड़ी देर सोचने लगी और दुकानदार से बोली, ‘ठीक है मैं आ जाऊंगी अभी के लिए मुझे और राशन पानी दे दो’.

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अब शाम हुई सभी भक्तों चले गए. पत्नी तैयार सज धज के बैठी थी लेकिन, बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी. कबीर ने अपनी पत्नी से पूछा, ‘क्या बात है तुम तैयार होकर क्यों बैठी हो? कहीं जाना है क्या? तब उसने सारी बातें कबीर दास जी को बताई. ‘ठीक है चली जाओ’ कबीर दास जी ने कहा. लेकिन इतनी रात को वो भी तेज बारिश में तुम कैसे जाओगी? चलो मैं तुम्हें छोड़ कर आता हूं. छाता लेकर दोनों निकल गए. दुकानदार के घर पर पहुंचने पर दरवाजा खटखटाया. वह दुकानदार उत्सुकता से उसी का इंतजार कर रहा था. पहले तो उसे लगा कि वह नहीं आएगी उसने मुझे धोखा दे दिया.

दरवाजा खोला तो वह सामने खड़ी थी. दुकानदार थोड़ा डरा उसने सोचा कि, कबीरदास जेसे संत की पत्नी इतनी आसानी से कैसे मान गई. उसे डर लगने लगा. जब उसने देखा कि, बारिश में भी उसके कपड़े भीगे नहीं है. दुकानदार ने उससे पूछा, ‘यह चमत्कार कैसे हुआ? महिला ने जवाब दिया, ‘स्वयं मेरे पति (कबीरदास जी) मुझे छोड़ने यहां आए. तो वह दुकानदार हक्का-बक्का रह गया. वह लड़खड़ाने लगा. उसने पूछा, कहां है कबीर दास जी? कबीर जी के पास दुकानदार रोते हुए गया. और उनके चरणों में गिर गया. हे प्रभु मुझसे अनजाने में यह गलती हो गई. मुझे माफ कर दो. दुकानदार को उसकी करणी का पछतावा हुआ.

4. kabir saheb ki kahani

कबीरदास और एक परेशान शिष्य की कहानी

हर रोज की तरह ही कबीर साहेब जी आज भी प्रवचन दे रहे थे. उनके प्रवचनों को सुनने के लिए दूरदराज से सभी धनी और गरीब लोग आते थे. प्रवचन खत्म हुआ सभी लोग जाने लगे. परंतु वहां एक व्यक्ति बैठा रहा. कबीर दास जी ने उससे पूछा कोई समस्या है तो बताओ. वह व्यक्ति बोला गुरुजी मेरा गृहस्थ जीवन ठीक नहीं चल रहा है. आए दिन किसी न किसी सदस्य के साथ मेरे झगड़े होते हैं. मुझे इसका उपाय बताइए.

कबीर दास जी ने अपनी पत्नी (लोई) को एक दीपक जला कर लाने को कहा. कबीर जी की पत्नी जलता हुआ दीपक लाई और उनके पास रख दिया. वह व्यक्ति सोच में पड़ गया कि, इतनी कड़ी धूप में दिए की क्या जरूरत है? कबीर दास जी ने अपनी पत्नी को फिर बोला कुछ खाने के लिए मीठा लेकर आओ. लेकिन उनकी पत्नी मीठी की जगह नमकीन लेकर आई.

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वह व्यक्ति फिर हैरान रह गया. और सोचने लगा है कि मीठी लाने की बजाय नमकीन लेकर आई उस व्यक्ति को कुछ समझ में नहीं आता. और वह वहां से आने लगता है. तभी कबीर दास जी उसे रोकते हैं और समझाने की कोशिश करते हैं. मेरी पत्नी इतनी धूप में दीपक लेकर आई हो सकता है कि, उसने सोचा हो कि मुझे कोई काम होगा. मेरे मीठे मंगाने पर वह नमकीन लेकर आई तो हो सकता है. घर में कुछ मीठा ना हो. यह मेरे और मेरी पत्नी के बीच अटूट विश्वास है.

उस व्यक्ति को समझाते हुए कबीर दास जी ने कहा. ऐसी बातों पर आपसी टकराव करने की बजाय इसके पीछे का कारण जानना चाहिए. एक सुखी गृहस्थ जीवन का यही रहस्य है कि, आपसी विश्वास बढ़ाने से ही तालमेल बना रहता है. यह सुनकर वह व्यक्ति बोला धन्य हे प्रभु आप!

इस आर्टिकल में आपने महान संत कबीर साहेब की कथा, कहानी (kabir das ki kahani) पढ़ी. आशा करता हूँ. यह आर्टिकल आपको अच्छा लगा होगा. हमारे अन्य जानकारी भरे आर्टिकल भी अवश्य पढ़े.

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4 thoughts on “Sant Kabir Das ki kahani | कबीर दास की कहानी-कथा इन हिंदी”

  1. केशव सैन

    आपसे जानकारी दूबारा रिपिट हो गया और जानना चाहता हू कबीरजी के बारे मे मदद किजिए

    1. Jaynandan Prasad Sahni

      इनके बारे में क्या मदद लेने की अपेक्षा रखते है आप, ये इतने बड़े संत थे इन्हे कोटि कोटि🙏 नमन

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